कोरोना और ज्योतिष: क्यों मचा है हाहकार,कौन से ग्रह हैं कोरोना के लिए जिम्मेदार

Three Vs : ग्रहों का इस जीव-जगत में विशेष महत्व है,जिसमें शनि, राहु-केतु ये तीनों ग्रह अचानक आपदा,आर्थिक तेजी-मंदी ,गरीबी-अमीरी तथा सृष्टि में अप्रत्याशित परिणामों के जनक माने जाते हैं।

शनि के खेल, काले और निराले : न्यायधीश शनि जब भी अपनी स्वराशि या सूर्य के उत्तराषाढा नक्षत्र में आते हैं, तो हाहाकार मचा देते हैं। संसार को


बैलेंस में रखने की जवाबदारी शनि,राहु व केतु इन्हीं तीनों ग्रहों के पास है। शनि, गरीब को धनी बनाने में


कारक है। लेकिन जब शनि से हुई तना-तनी, तो उसकी पत्नी को भी भटका देता है।

राहु

राहु, राजनीति, भौतिक सुख देने मेंऔऱ केतु आध्यात्मिक शक्ति,सिद्धि द्वारा शून्य से शिखर पर पहुंचाने में सर्वश्रेष्ठ ग्रह है। ये तीनों कब किसको राजा से रंक और फकीर से अमीर बना दे- इस पहेली को समझना बहुत मुश्किल है।

शिव रूप शनि का न्यायताण्डव :

पहले भी शनिदेव का अपनी स्वराशि मकर में आना अनेक महामारी का कारक रहा है।

ग्रहों का मायाजाल है सब इस समय गोचर में शुक्र उत्तराषाढ़ा यानि सूर्य के नक्षत्र के अधीन मकर राशि में विचरण


कर रहे थे। शुक्र में जब-जब सूर्य के नक्षत्र में आते हैं,तो नए-नवीन खतरनाक संक्रमण पैदा करते है।

धनु राशि में गुरु केतु की युति चांडाल योग बन रहा है, जो संसार को धर्म की तरफ उन्मुख या प्रेरित करेगा।

इंसानो में योग-ध्यान की अभिलाषा जागृत होगी। दिखावा, भौतिकता पर अंकुश लगेगा। गुरु-केतु योग महाविनाश का कारण बनाने में सहायक होगा।

हो सकता है कि- इस समय अच्छे-अच्छे, धनाढ्य, धनपतियों की सम्पदा-अहंकार सब स्वाहा हो जाए।

शेयर-सट्टा और सत्ता की दम पर शेर बनने वाले चूहे बनकर बिल (जेल)में जा सकते हैं। क्योंकि इस समय पाताल और पृथ्वी की कमान स्वयं शिव के हाथों में है।

राहु वर्तमान गोचर में मिथुन राशि,आद्रा में वक्री होकर विचरण कर रहे हैं।

ये वक्त परमपिता परमात्मा महादेव के न्याय का है। सीधे-सच्चे,ईमानदार गरीबों के रक्षक हैं और चराचर जगत के

कल्याणकारी देवता है।


भविष्य पुराण के मुताबिक सादा जीवन-उच्च विचार के विपरीत चलने से, प्राचीन पवित्र परंपराओं को नहीं अपनाने


से, शुद्धिकरण, पवित्रता का ध्यान न रखने के कारण सूर्यदेव संक्रमित होकर रोग-विकार,महामारी उत्पन्न करने लगते हैं…

सूर्य का प्रकोप हैकोरोना

तन-मन, आत्मा और विचारों को शुद्ध-पवित्र बनाए रखने से शरीर स्वस्थ्य-तंदुरुस्त बना रहता है। भगवान भास्कर की कृपा बनी रहती है। शास्त्रों में सूर्य को इसी वजह से स्वास्थ्य प्रदाता कहा है। सृष्टि में सभी चराचर जीव-जगत की आत्मा सूर्य ही है।

कहा भी जाता है आत्मा-सो-परमात्मा….वेद मन्त्र है-ऋग्वेद(1.112.1), यजुर्वेद(7.42) और अथर्ववेद(13.2.35) में एक श्लोक है

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च

जो कि क्रमशः सूर्य को आत्मा की ऊर्जा मानने की पुष्टि करता है।

इस मंत्र में सूर्य को स्थावर-जंगम पदार्थों की आत्मा माना गया है।सूर्य की प्रसन्नता से हम जीवेमशरदः शतम्‌ (यजुर्वेद 36/24) सौ वर्ष तक स्वस्थ्य रहकर,100 साल जीवित रह सकते हैं।

बोलने-सुनने की प्रार्थना भी ईश्वरस्वरूप सूर्य से की जाती है। सूर्य वैज्ञानिक परमहंस श्री श्री विशुद्धानंद जी महाराज ने


खोजा कि यदि ऊर्जा-ऊष्मा हमारे अंदर सुरक्षित रह सके, तो हम चार सौ वर्ष तक निरोगी होकर जीवित रह सकते हैं।

आयुर्वेद की प्राचीन पुस्तकों में मिलता है-कोरोना वायरस जैसा संक्रमण
शालक्य विज्ञान, आयुर्वेद चिकित्सा,


परजीवी तंत्र, काय चिकित्सा, निघंटू आदर्श, विषैली वनस्पतियां, माधव निदान, योगरत्नाकर,रसराज महोदधि,

तंत्र महोदधि, अर्क प्रकाश आदि में अनेक तरह के संक्रमण के विषय में लिखा है-

आयुर्वेद ग्रंथ में एक श्लोक का वर्णन है,जो आज के कोरोना वायरस से मेल खाता है-

कोरोना के लक्षण :

मृत्युश्च तस्मिन् बहु पिच्छिलित्वात्त्।


शीतस्य जंतो: परित: सरत्वात।।

स्वेदो ललाटे गृहं मृत्य:

अर्थात-रोगी का शरीर ठंडा और चिपचिपा हो, ललाट पर चिपकता ठंडा पसीना,आ रहा हो तथा श्वास कंठ में, तो चलती हो पर वक्ष यानि फेफड़ों तक न पहुंचती हो। सात दिन से लगातार सूखी खांसी, जुकाम सर्दी हो। ऐसा व्यक्ति संक्रमित हो जाता है। अतः इसे छूने से दूसरे व्यक्ति को भी संक्रमण हो सकता है। यदि ऊपर के सभी लक्षण मिलते हैं, तो ऐसा संक्रमित मनुष्य किसी भी पल यमालय को जाने वाला है यानि तत्काल मौत के मुख में जा सकता है।

वह ज्यादा घंटे भी नहीं जी सकता। वर्तमान में फैले कोरोना वायरस के भी यही लक्षण हैं।

आयुर्वेद में भी है, संक्रमण से सुफड़ासाफ का उल्लेख

हजारों वर्ष पहले महर्षि चरक ने लिखा है कि देहेन्द्रिय मनस्तापी सर्व रोगाग्रजो बली।

देह, इन्द्रिय एवं मन में भारी संताप का प्रादुर्भाव होने लगे,तो समझ लेना पृथ्वी किसी भयंकर संक्रमण की चपेट में आ जाएगी।

हरिवंश पुराण में संक्रमण का स्वरूप नियमानुसार बताया है-

दक्षापमान

संक्रुद्ध:

रुद्रनि: श्वास सम्भव:

अर्थात यह रौद्र यानि सूर्य द्वारा प्रकोपित

महाभयानक व्याधि उत्पन्न होगी, जिससे आधा संसार नियति के नियमों को अपनाने पर मजबूर हो जाएगा। संक्रमनस्तु पूजनैवार्वाsपि

सहसैवोपशाम्यति।।


अर्थात

संक्रमण या किसी तरह के खतरनाक वायरस देव कोपजन्य व्याधि है।

इससे विकार-व्याधि, वायरस से बचाव हेतु सूर्य की किरणों के सामने बैठें। सूर्य का ध्यान, सूर्य नमस्कार करें।

अग्नि पुराण में संक्रमण से सुरक्षा तथा शांति के लिए सूर्य देवर्चना पूजा का विधान बताया है। इसलिए किसी भी तरह

के संक्रमण में रुद्र या सूर्य उपासना करने से सहसा दूर हो जाता है।

धन्वंतरि संहिता में


संक्रमण के लक्षण बताए हैं


स्वेदारोध: संताप: सर्वाग्रहणं तथा।

युगपद् यत्र रोगे ज्वरो व्यपदिश्यते।।

अर्थात- जिस बीमारी में स्वेदवह(शरीर से पसीना निकलना) स्त्रोतों का प्रायः अवरोध हो जाए, सारे अंग में अकड़न महसूस हो और संताप यानिदेहताप (अंदर गर्माहट बाहर जुकाम) तथा मनस्ताप (भय-भ्रम, डर)उत्पन्न हो जाए। सर्दी-जुकाम, सर्दी-सूखी खांसी निरंतर बनी रहे, तो मनुष्य संक्रमण से पीड़ित हो रहा है। ऐसे लोगों का जीवन क्षण भंगुर होता है।

मनस्ताप अर्थात मन की बीमारी जांचने का कोई थर्मा मीटर नहीं निर्मित हुआ है।

स्वेदवह क्या है

दोषवहानि च स्रोतांसि सर्वशरीरचराण्येव। च. वि. 5/3 पर आचार्य चक्रपाणि


स्वेदवह, दोषवह, अंबुवह स्रोतों में अधिष्ठित समानवायु के द्वारा ‘रसरक्त’ को हृदय की ओर लाया जाता है।

ज्योतिषीय गणना के मुताबिक भी यह समय संक्रमण काल है-वेदों में उल्लेख है-कलयुग में ऐसी

भारी व्याधि, वायरस/संक्रमण उत्पन्न होंगे कि मनुष्य का पल में प्रलय हो जाएगा। इस संक्रमित काल में एक-दूसरे को छूने मात्र से मनुष्य तत्काल संक्रमित होकर छुआछूत से मर जाएगा। रोगों को ठीक करने का मौका नहीं मिलेगा।

ज्योतिष या एस्ट्रोलॉजी में कोरोना वायरस के कारण

अथर्ववेद सूक्त-२५ के अनुसार-

अधरांच प्रहिणोमि नमः कृत्वा तक्मने।

मकम्भरस्य मुष्टि हा पुनरेतु महावृषान्।।

अर्थात-

कलयुग में कोई-कोई संक्रमण बड़ा भयानक विकार होगा। यह शक्तिशाली देश और पुष्ट मनुष्य को भी मुट्ठियों से


मारने वाला सिद्ध होगा।

यह वायरस अति वर्षा या सर्वाधिक जल भरे देशों में हर साल, बार-बार आएगा।

शनि से जब हो अन्याय की तनातनी

5 नवंबर 2019 को शनि देव 30 साल बाद पुनः अपनी स्वयं की मकर राशि में विराजमान हुए हैं। मकर पृथ्वी तत्व की राशि है। जब-जब शनि देव पृथ्वी तत्व की राशि में आते हैं, तब-तब पृथ्वी पर भूचाल मचा देते हैं। सूर्य के नक्षत्र में आने पर शनियह विकार प्रदाता ग्रह हो जाते हैं।

कबकब चली शनि की छैनी

सन् 547 में शनिदेव इसी मकर राशि में जब आए और राहु मिथुन राशि में थे। गुरु-केतु की युति ने दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी को परेशान कर दिया था। मिस्र/इजिप्ट से फैला बुबोनिक नामक वायरस जिसे ‘फ्लैग ऑफ जस्टिनयन’ कहा गया।

बाद में इसने रोमन साम्राज्य की नींव हिला दी थी।इससे पहले भी ऐसे ग्रह योग ने मचाई थी तबाही…इतिहासकार प्रोसोपियस के अनुसार यहां एक घंटे में 10 से 15 हजार लोगों को इस वायरस ने मौत की नींद सुला दिया था।


हिस्ट्री ऑफ डेथ नामक किताब के हिसाब से सन 1312 के आसपास शनिदेव जब अपनी ही स्वराशि मकर

में आए, संयोग से राहु तब भी आद्रा नक्षत्र के मिथुन राशि में वक्री गति से परिचालन कर रहे थे, तब 75 लाख लोग फ्लैग वायरस की वजह से कुछ ही दिन में मर गए थे। यह विभत्स दिन आज भी ब्लेक डेथ के नाम से कलंकित है।

सन 1343 से 1348 के मध्य भी अपनी खुद की राशि मकर-कुंभ में आए, तो फ्लैग वायरस ने 25 से 30 हजार

लोगों को फिर मौत की नींद सुला दिया था।

शनि करते हैं पिता सूर्य का सम्मान

दरअसल शनि के पिता सूर्य हैं और सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है।

जब लोग नियम-धर्म या प्रकृति के विपरीत चलते हैं,तो सूर्य की शक्ति क्षीण और आत्मा कमजोर हो जाती है।


शनि, गुरु, केतु यह तीनों भौतिकता या एशोआराम के विपरीत ग्रह हैं। दुनिया जब अपनी मनमानी करने


लगती है, तब शनि कष्ट देकर, निखारकर लोगों को धर्म, ईश्वर, सद्मार्ग, अध्यात्म से जोड़कर धार्मिक बना देते हैं।

शनि उन्हीं को पीड़ित करते हैं,जो धर्म या ईश्वर को नहीं मानते। प्रकृति के खिलाफ चलने वालों को शनिदेव नेस्तनाबूद करके ही दम लेते हैं।

बिना स्नान किए अन्न ग्रहण, बिस्कुट आदि का सेवन करने से यह बहुत ज्यादा परेशान करते हैं।

शनि को सीधा निशाना उन लोगों पर भी होता है, जो शनिवार के पूरे शरीर में तेल नहीं लगाकर स्नान करते हैं।


शनिदेव को खुशबूदार इत्र, गुलाब,चन्दन, अमॄतम कुंकुमादि तेल,जैतून, बादाम तेल अतिप्रिय हैं।

शनि की मार से मरा, फिर संसार

सन् 1667 के आरंभ में शनिदेव जब मकर राशि में आए, तो एक दिन में लाखों लोगों को लील गए, जिसे फ्लैग ऑफ लंदन कहते हैं।

10 फरवरी 1902 के दिन शनि ने पुनः मकर राशि के उत्तराषाढ़ा सूर्य के नक्षत्र में आकर दुनिया में बीमारियों का कहर बरपा दिया था, जब अमेरिका के सनफ्रांसिको में लाखों लोग पल में प्रलय को प्राप्त हुए।

गुजरात के सूरत शहर में जब एक रहस्यमयी बीमारी के चलते लाखों लोग संक्रमित हुए थे तब भी शनिदेव अपनी ही स्वराशि मकर में गोचर कर रहे थे।

केतु का काला करिश्मा

सन 1991 में ऑस्ट्रेलिया में माइकल एंगल नाम का बड़ा कम्प्यूटर वायरस सामने आया था जिसने इंटरनेट और कम्यूटर फील्ड में वैश्‍विक स्‍तर पर बड़े नुकसान किये थे और उस समय भी गोचर में गुरु-केतु का चांडाल योग बना हुआ था।

अभी 15 वर्ष पूर्व सन 2005 में एच-5 एन-1नाम से एक बर्डफ्लू फैला था और उस समय में भी गोचर में बृहस्पति-केतु चांडाल का योग बना हुआ था।

ऐसे में जब भी गुरु-केतु एक ही राशि में एक साथ होते हैं, तो इस तरह की महामारी फैलती है। उस समय में बड़े संक्रामक रोग और महामारियां सामने आती हैं।

2005 में जब गुरु चांडाल योग (बृहस्पति-केतु युति) के दौरान बर्डफ्लू सामने आया था।

कोरोना वायरस का कारक शनि भी हो सकता है

सन 2019 नवम्बर में शनि मकर राशि के उत्तराषाढा नक्षत्र में प्रवेश करते ही दुनिया धधक उठी। उत्तराषाढा नक्षत्र के अधिपति भगवान सूर्य हैं। जब तक शनि इस नक्षत्र में रहेंगे,तब तक प्रकार से दुनिया त्रस्त और तबाह


हो जाएगी। अभी जनवरी 2021 तक शनि, सूर्य के नक्षत्र रहेंगे। अभी यह अंगड़ाई है। 22 मार्च 2020 को शनि के साथ मंगल भी आ जाएंगे। मंगल भूमिपति अर्थात पृथ्वी के स्वामी है। इन दोनों का गठबंधन और भी नए गुल खिलाएगा। मकर मंगल की उच्च राशि भी है।

अनेक अग्निकांडों से, जंगल में आग आदि विस्फोटों से सृष्टि थरथरा जाएगी। इस समय कोई देश परमाणु हमले भी कर सकता है। शनि-मंगल की युति यह बुद्धिहीन योग भी कहलाता है।

2020 में क्लेश ही क्लेश

गुरु-केतु की युति से निर्मित चांडाल योग राजनीति में बम विस्फोट करता रहेगा। राज्य सरकारों की अदला-बदली का रहस्यमयी खेल चलता रहेगा।कुछ बड़े राजनेताओं, पुलिस अधिकारीयों,न्यायधीशों के जेल जाने से देश में अफरा-तफरी का माहौल बनेगा।

दुनिया के कई देशों में बमबारी हो सकती है। गृहयुद्ध, कर्फ्यू आदि लग सकता है। कुछ देश अपने ही नागरिकों को मारने का भरसक प्रयास करेंगे। मानव संस्कृति के लिए ये वक्त बहुत भयानक होगा। शनि के संग मंगल की युति किसी अप्रिय घटना का इतिहास बनाता है।

इस समय ऐसी घटनाएं उन फर्जी लोगों के साथ ज्यादा होंगी, जो बाला जी की अर्जी लगाकर, अपनी मनमर्जी से चलते हैं। यह समय बहुत भय-भ्रम, आकस्मिक दुर्घटनाओं के वातावरण से भरा होगा। किसी-किसी देश में इमरजेंसी जैसा माहौल हो सकता है। कुछ देश टूट भी सकते हैं। बंटवारे की भी संभावना है।

कोरोना वायरस जैसी महामारी के साथ-साथ और भी बीमारियां मानव जाति को खत्म कर सकती हैं,जो लोग अधार्मिक हैं।

वेद एवं ज्योतिष कालगणना अनुसार कलयुग में जब सूर्य-शनि एक साथ शनि की राशि मकर में होंगे। राहु स्वयं के नक्षत्र आद्रा में परिभ्रमण करेंगे और विकार या विकारी नाम संवत्सर होगा।

क्या है विकार नामक संवत्सर

जैसे साल में बारह महीने होते हैं, वैसे ही संवत्सर 60 होते हैं। यह वर्ष में 2 आते हैं। तीस साल बार पुनः प्रथम संवत्सर

का आगमन होता है। विकार या विकारी नामक हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है।

यह 60 संवत्सरों में तेतीसवां है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में भयंकर विकार या वायरस फैलते हैं। इसीलिए इसे

विकारी नाम संवत्सर कहा जाता है। जल वृष्टि या वर्षा अधिक होती है। मौसम में ठंडक रहती है। इस समय

पृथ्वी/प्रकृति के स्वभाव को समझना मुश्किल होता है।

विकार नामक संवत्सर के लक्षण/फल:

मांस-मदिरा सेवन करने वाले दुष्ट व शत्रु कुपित दुःखी या बीमार रहते हैं और श्लेष्मिक यानि कफ, सर्दी-खांसी,

जुकाम का पुरजोर संक्रमण होता है। पित्त रोगों की अधिकता रहती है। चंद्रमा को विकारी संवत्सर का स्वामी कहा गया है।

सन 2019 के अंत के दौरान गुरु-केतु की युति से चांडाल योग निर्मित हुआ। यह बड़े-बड़े चांडाल, फ्रॉड, बेईमान

दयाहीन, अहंकारी लोगों को सड़कों पर लाकर खड़ा कर देगा।

भयानक गरीबी, मारकाट फैलने का भय हो सकता है। एक आंख में सूरज थामा, दूसरे में चंद्रमा आधा। चारों वेदों में सूर्य को ऊर्जा का विशालस्त्रोत और महादेव की आंख माना है।

दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम्

सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्।।

भावार्थ: सूर्य ही एक मात्र ऐसी शक्ति है,जो देह को रोगरहित बनाकर लंबी उम्र,बल-बुद्धि एवं वीर्य की वृद्धि कर

सभी व्याधि-विकार, रोग-बीमारी,शोक-दुःख का विनाश कर देते हैं।

संक्रमण/वायरस प्रदूषण नाशक सूर्य

सूर्य एक चलता-फिरता, मोबाइल प्राकृतिक चिकित्सालय है। सूर्य की सप्तरंगी किरणों में अद्भुत रोगनाशक शक्ति होती है।

अथर्ववेद (3.7) में वर्णित है


उत पुरस्तात् सूर्य एत, दुष्टान् ध्नन्

अदृष्टान् , सर्वान् प्रमृणन् कृमीन्।


अर्थात-


सूर्य के प्रकाश में, दिखाई देने या न

दिखने वाले सभी प्रकार के प्रदूषित जीवाणुओं-कीटाणुओं और रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता है। सूर्य की सप्त किरणों में औषधीय गुणों का अपार भंडार है।

प्रातःकाल से सूर्यास्त के मध्य भगवान सूर्य अनेक रोग उत्पादक विषाणुओं-कीटाणुओं तथा संक्रमणों का नाश करते हैं। वात रोग, त्वचा के विकार और किसी भी तरह के संक्रमण या वायरस मिटाने के लिए सूर्य की किरणें सर्वश्रेष्ठ औषधि है।

ट्यूबरक्लोसिस यानि टीबी के कीटाणु

सूर्य के तेज प्रकाश से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, जो उबलते जल से भी शीघ्र नहीं मरते, फिर दूसरे जीवाणुओं के नाश होने में संदेह ही क्या है।

सूर्य का प्रकाश और हवा सबसे बड़ी दवा है।


प्रातः की वायु, आयु बढ़ाती है।


सूर्य में सात रंग की किरणें जगत में ऊर्जा व चेतना भरती है।

सूर्य की ऊर्जा व रोशनी में मानव शरीर के कमजोर अंगों को, हड्डियों को पुन: सशक्त और सक्रिय बनाने की अद्भुत क्षमता है।

स्वस्थ्य शरीर हेतु जिस रंग की कमी हमारे शरीर में होती है, सूर्य के सामने प्रणाम करने, अर्घ्य देने, सूर्य की उपासना


से वे उपयुक्त किरणें हमारे शरीर को प्राप्त होती हैं।

वेद ऋषियों ने कहा है….

आदित्यस्य नमस्कारं

ये कुर्वन्ति दिने दिने।

भाग्योदय हेतु सूर्योदय के समय सूर्यमुखी होकर सूर्य नमस्कार करने से हर दिन यश, स्वास्थ्य, सम्मान, बुद्धि और धन देने वाली है।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण Three Vs के नहीं हैं और Three Vs इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है)

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